जब ‘स्तन’ ढकने के लिए चुकानी पड़ती थी कीमत!

पितृसत्तात्मक समाज में महिलाएं हमेशा से ही अपने अधिकार और सम्मान के लिए संघर्ष करती रही हैं। आज भले ही भारत के सुप्रीम कोर्ट ने हर महिला को अपने पिता के संपत्ति में बराबर का अधिकार दिया है लेकिन एक समय वह भी था जब महिलाओं को अपने तन ढकने के लिए भी कर देना पड़ता था।

ऐसे में समानता और अधिकार तो बहुत दूर की बात है जब अपना शरीर ढकने के लिए महिलाओं को कर देना पड़े तो उस समाज में आप महिलाओं की दुर्दशा का अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं। यह लगभग 300 साल पहले की बात है जब दक्षिण भारत में यह ‘कर’ बेहद ही प्रचलित था। अपने स्थन को ढकने के बदले अपने राजा को कर देने की प्रणाली को ‘मुलाक्कारम’ कहा जाता था।

अगर कोई महिला कर देने में सक्षम नहीं है तो उसे अपने ऊपरी शरीर यानी कि स्तन को बिना ढके ही रहना पड़ता था। इस मानसिकता के पीछे सिर्फ यही वजह थी कि उच्च जातियों और नीची जातियों में अंतर स्थापित किया जा सके। क्योंकि उस समय में वस्त्र प्रतिष्ठा और सम्मान का विषय हुआ करता था।

वहीं इस कर की वजह से छोटी जाती के लोगों के ऊपर अतिरिक्त भार बढ़ने लगा और वो पहले गरीब बने फिर कर्जदार।
इस कर को वसूलने के लिए राजा के अधिकारी छोटी जाति के घरों में जाते और उनसे कर वसूल कर ले आते थे। इसमें भी बेहद शर्मनाक बात यह थी कि यह कर औरतों के स्तन के आकार के अनुसार लिया जाता था।

हालाँकि जबभी अत्याचार अपनी सीमा के बाहर जाता है तो कोई न कोई आंदोलनकारी पैदा होता ही है। इस कर प्रथा विरोध में भी ऐसा ही हुआ और एक ‘नंगेली’ नामक महिला ने अपना बलिदान दे कर लोगों को जगाने का कार्य किया। अल्पपुज़हा के चेर्थला गांव में रहने वाली नंगेली बेहद गरीब थी लेकिन वह तन ढकने के लिए राजा को कर दिया करती थी।

धीरे-धीरे नंगेली का परिवार भारी कर्ज में डूब गया जिससे व्यथित होकर नंगेली ने राजा को कर नहीं देने का निर्णय कर लिया। इस बार जब राजा के सैनिक कर लेने के लिए नंगेली के घर आए तब नंगेली ने केले के पत्ते बिछाकर उनके सामने अपने दोनों स्तन काट के रख दिए। इस भयंकर घटना के बाद राजा के सैनिक भाग खड़े हुए और नंगेली ने तड़प तड़प कर अपनी जान दे दी।

वहीं जब नंगेली के पति को इस बात का पता चला तब वह भी अपनी पत्नी की चिता के साथ जल कर मर गया। नंगेली तो नहीं रही लेकिन उसका यह बलिदान लोगों को अंदर तक झकझोर गया और ‘स्तन कर’ के खिलाफ लोग एकजुट होने लगे और आवाज उठाने लगे। यह साल 1803 की घटना थी और इसके बाद कहा जाता है कि 1813 आते -आते  इस व्यवस्था को बंद कर दिया गया। नंगेली के बलिदान के चलते उसके गांव को ‘मुलाचिपराम्भु’ के नाम से जाना जाता है।

‘मुलाचिपराम्भु’ का अर्थ है वह स्थान जहाँ पर स्तनों वाली महिला रहती थी।
कहा जाता है कि ‘पनायेरी नादर समुदाय’ की महिलाओं द्वारा भी स्तन कर का विरोध किया गया और इस विरोध को ‘चन्नर’ विद्रोह ने नाम से जाना गया।