भारत के पहले गुमनाम प्रधानमंत्री – मोहम्मद बकरतुल्ला खान

अंग्रेजों के जुल्मों और अत्याचारों से भारत को मुक्त कराने के लिए जितने भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हुए, जितने भी क्रांतिकारी हुए उनके बलिदान और त्याग की गाथा जितनी भी बार भी बताई जाये उतना ही कम है। महात्मा गांधी, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का नाम तो हम सभी के जुबान पर अंकित है लेकिन एक ऐसा क्रांतिकारी जो इतिहास में गुमशुदा हो गया उनके बारे में हम आज बात करेंगे।

‘मोहम्मद बकरतुल्ला खान’ का नाम शायद ही आप लोगों ने सुना होगा क्योंकि हमारे देश में इन्हे उस तरह की प्रसिद्धि नहीं मिली जिस प्रकार अन्य लोगों को मिली। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बरकतुल्ला खान को भारत के पहले प्रधानमंत्री बनने का भी गौरव प्राप्त है। बरकतुल्ला खान का जन्म 1854 ईसवी में मध्य प्रदेश के भोपाल में हुआ था। उन्हें अरबी, फारसी और अंग्रेजी शिक्षा की अच्छी समझ थी।

कहा जाता है कि यह जब इंग्लैंड पढ़ाई करने के लिए गए तब यही से इनके जीवन की बदलाव की शुरुआत हुई। इंग्लैंड में इनकी मुलाकात प्रवासी हिंदुस्तानी क्रांतिकारियों के लीडर श्याम जी कृष्ण वर्मा से हुई। कहा जाता है कि बकरतुल्ला खान उनके कार्यों से बेहद प्रभावित हुए कि वह भी भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए पूरी तरीके से तैयार हो गए। चुकी उनकी लेखनी बहुत प्रखर थी इसीलिए उन्होंने कलम को अपना हथियार बनाया और लगातार क्रांतिकारी लेख लिखते रहे। उनके लेख में इतनी धार होती थी कि जल्दी ही वो लोगों की नजर में आ गए।

धीरे -धीरे बकरतुल्ला खान का इंग्लैंड में विरोध शुरू हो गया और उन्हें इंग्लैंड छोड़ना पड़ा। इसके बाद वह 1899 में वो अमेरिका पहुंच गए जहां ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ उनका विरोध जारी रहा। बकरतुल्ला खान यहीं नहीं रुके वह लगातार यात्राएं करते रहे और अमेरिका के बाद उन्होंने जापान  को  चुना।

यहां भी उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज बुलंद की। इतना ही नहीं वह लगातार जोर देते रहे कि हिंदू और सिख के तरह ही भारत के मुसलमान भी अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई में शामिल हों। बरकतुल्ला खान ने कनाडा मैक्सिको और अमेरिका में रह रहे प्रवासी हिंदुस्तानियों कि एक टीम बनाई जिसका नाम ‘गदर पार्टी’ रखा। गदर पार्टी की स्थापना 13 मार्च 1913 को किया गया। बकरतुल्ला खान का सपना था कि जल्दी ही ब्रिटिश शासन को भारत से उखाड़ कर स्वराज की स्थापना की जाए।

इसके लिए उन्होंने एक अस्थाई सरकार का निर्माण भी किया जिसमें चंपक रामन पिल्लई, भूपेंद्र नाथ दत्ता, राजा महेंद्र प्रताप और अब्दुल वहीद खान आदि लोगों का समर्थन इन्हें मिला। राजा महेंद्र प्रताप के साथ मिलकर बकरतुल्ला अफगानिस्तान पहुंच गए। वहां उन्होंने अफगानी सरकार के साथ मिलकर एक समझौता किया जिसमें कहा गया कि अफगानी सरकार अंग्रेजों  के खिलाफ लड़ाई में भारत का साथ दें इसके बदले अफगानिस्तान को बलूचिस्तान और पख्तूनी भाषा -भाषी क्षेत्र वापस कर दिया जाएगा।

इस अस्थाई सरकार में बकरतुल्ला खान को प्रधानमंत्री तथा राजा महेंद्र प्रताप को राष्ट्रपति घोषित किया गया था। हालांकि बकरतुल्ला खान का भारत को स्वतंत्र कराने का सपना पूरा नहीं हो सका और अपनी लंबी बीमारी के चलते 27 सितंबर 1927 को उन्होंने अमेरिका में ही अपने प्राण त्याग दिए। अपने वतन के लिए लागातार संघर्ष करने वाले मोहम्मद बकरतुल्ला खान के त्याग को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता।