कौन थे चकमा और हजोंग शरणार्थी जिन्हें भारत ने अपनी नागरिकता दिया

यह 1964- 65 की बात है जब चकमा और हजोंग जनजातियां भारत में आकर शरण लेना शुरू कर चुकी थी। ये जनजातियां चटगांव पहाड़ी इलाकों की रहने वाली है, यह क्षेत्र मुख्य रूप से पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच पड़ता है। यह क्षेत्र पहले पाकिस्तान में था हालांकि बंटवारे के बाद बांग्लादेश का हिस्सा है। चकमा जनजाति की बात करें तो यह बौद्ध धर्म को मानने वाले जनजाति है तो हजोंग हिंदू धर्म को मानने वाले जनजाती है।

ज्ञात हो कि इन जनजातियों का अपने देश में शोषण होता था जिसके चलते यह जातियां सुरक्षित स्थान की तलाश में भारत में आकर बसना शुरू कर दीं। हालाँकि इनके विस्थापन की प्रमुख कारणों को यह भी माना जाता है कि 1965 के दौरान बांग्लादेश का कप्ताई बांध टूट गया था जिसके चलते इन जनजातियों के इलाके में पानी भर गया था।

ऐसे में इनका घर बार सब डूब चुका था और इनके पास नहीं रहने के लिए घर और खाने के लिए अनाज नहीं था और यह जनजातियां तब भारत का रुख कर दी। अगर भारत की बात करें तो हजोंग जनजाति भारत के पूर्वोत्तर राज्य, पश्चिम बंगाल और म्यांमार में भी पाई जाती है।

अपने शुरुआती दिनों में यह जनजातियां असम क्षेत्रों में घुसपैठ करके बसने लग गई थी। दोनों जनजातियों के आकर बसने की वजह से वहां के स्थानीय लोगों और इन जनजातियों में टकराव शुरू हो गया जिसके चलते सरकार ने इन्हें अरुणाचल प्रदेश की तरफ शिफ्ट कर दिया। इसके बावजूद कुछ लोग फिर भी असम में ही रुक गए थे।

हालांकि अरुणाचल प्रदेश में भी इन को स्वीकार नहीं किया गया और नए-नए बसे अरुणाचल प्रदेश ने इनका विरोध शुरू कर दिया। हिमाचल प्रदेश सरकार का कहना था कि हमारे प्रदेश में जनता प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है और यह प्राकृतिक संसाधन सीमित मात्रा में हैं।

ऐसे में बाहरी लोगों के आने से यहां के स्थानीय निवासियों के ऊपर बोझ बढ़ेगा। उस समय तक अरुणाचल को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिला था और वह प्रशासन के द्वारा ही चलाया जाता था। ऐसे में हिमाचल प्रदेश के कुछ छात्र संगठनों ने इन जनजातियों के खिलाफ आंदोलन की आग को खूब हवा दी। 1987 में जब अरुणाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ तब यह आंदोलन और बड़ा रूप ले चुका था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन जनजाति के लोगों को भारत की नागरिकता प्राप्त करने के लिए आवेदन के आदेश जारी कर दिए थे।

बावजूद इसके अब तक इन्हे भारत की नागरिकता नहीं मिली थी। उनके संघर्ष की कहानी यहीं खत्म नहीं होती है, इन जनजाति के लोगो को भारत की नागरिकता नहीं मिलने के कारण नौकरी और शिक्षा स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए भी बेहद संघर्ष करना पड़ता था। हालांकि सरकार द्वारा अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले में कुछ जमीन जरूर आवंटित की गई जिससे ये खेती कर अपना अपनी जीविका चला सकें। वहीं इनकी युवा पीढ़ी पलायन कर दूसरे राज्यों में भी गए ताकि नौकरी कर सकें मगर नागरिकता की कमी के कारण इन्हें वहां भी परेशानी उठानी पड़ी।

वहीं साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए 3 महीने के अंदर इन जनजातियों को भारत की नागरिकता देने का आदेश जारी किया इसके बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू और केंद्र में मंत्री किरण रिजिजू और केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मिलकर एक बैठक की और जनजाति के लोगों को भारत की नागरिकता प्रदान करने पर सहमति बनाई। हालांकि इनको जमीनी हक नहीं दिए जाने की भी शर्त रखी गयी। कुल मिलाकर अपने 50 साल के लंबे संघर्ष के बाद चकमा और हजोंग जनजाति आज भारत की नागरिकता के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रहे है।