अकेला जाट योद्धा ‘राजा सूरजमल’ की कहानी

आपने इतिहास में बहुत सारे राजपूत योद्धाओं और राजाओं की कहानी सुनी होगी जो अपनी वीरता और देशप्रेम के लिए जाने गए। लेकिन राजा सूरजमल के बारे में इतनी बातें प्रचलित नहीं है जबकि वो एकमात्र ऐसे जाट राजा थे जिन्होंने अपनी वीरता के कारण राजपूत राजाओं में अपनी विशेष स्थान बनाएं। अभी रिलीज हुई बॉलीवुड पानीपत में विवादित कहानी को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। यह विवादित कहानी महाराजा सूरजमल की है। महाराजा सूरजमल के14 वे वंशज विश्वेंद्र सिंह का भी कहना है कि महाराज सूरजमल की कहानी को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है जिसके कारण जाट समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचा है।

बता दें कि राजा सूरजमल का जन्म 13 फरवरी 1707 ईस्वी को हुआ था। उनके पिता का नाम राजा बदनसिंह था। राजा सूरजमल ने 1733 ईस्वी में भरतपुर नामक रियासत की स्थापना की थी। यह मौजूदा समय में राजस्थान का भरतपुर शहर कहलाता है। राजा सूरजमल इतने वीर और पराक्रमी थे कि अपने राजा बनने के कुछ ही समय के अंदर उन्होंने अपने देश की सीमाओं को दिल्ली और फिरोज शाह कोटला तक फैला लिया। राजा की इस बढ़ती हुई वीरता को देखकर उस समय दिल्ली का नवाब गाजीउद्दी इन्हे रोकने की कोशिश करने लगा।

इसके लिए उसने उस समय मराठों को भड़काना शुरू कर दिया। नवाब गाजीउद्दी के भड़काने में आकर मराठों ने राजा सूरजमल के ऊपर आक्रमण कर दिया और उनके किले को 6 महीने तक घेरे रखा। हालांकि इतिहास में यह कहा जाता है कि 6 महीने तक किले के बाहर बैठने के बाद भी मराठा भरतपुर पर कब्जा नहीं कर पाए और उन्हें उल्टे पांव लौटना पड़ा। राजा सूरजमल के द्वारा भरतपुर में लोहागढ़ किला का निर्माण कराया गया था जिसे अभेद किला भी कहा जाता है।

कहा जाता है कि यह किला मिट्टी से बना था लेकिन इसकी दीवारें इतनी चौड़ी और मजबूत हैं की तोप के गोले भी इस किले की दीवारों को तोड़ नहीं पाते थे। अंग्रेजों ने 13 बार भरतपुर के इस अभेद किले पर आक्रमण की लेकिन उन्हें एक बार भी सफलता हासिल नहीं हुई। जैसे कि हम सब जानते हैं मराठों ने मुगलों के भड़काने पर राजा सूरजमल पर आक्रमण कर दिया था बावजूद इसके राजा सूरजमल ने वक्त आने पर मराठा सैनिकों की सहायता की थी।

पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठा सैनिक बुरी तरीके से घायल हो गए थे और उनके पास खाने-पीने का भी सामान नहीं बचा था। तब ऐसी हालत में राजा सूरजमल ने उनके साथ संधि कर ली और मराठों की भरपूर सहायता की। कहा तो यह भी जाता है कि राजा सूरजमल ने 6 महीने तक घायल मराठा सैनिकों को अपने यहां आश्रय दिया और उनकी सेवा की। 25 दिसंबर 1763 ईस्वी में हिंडन नदी के किनारे नवाब नजीबुद्दौला और राजा सूरजमल के बीच हुए युद्ध में महाराज सूरजमल वीरगति को प्राप्त हुए। राजस्थान में महाराजा सूरजमल को उनकी वीरता और दयालुता के लिए आज भी जाना जाता है।