दिल्ली का अग्निकांड प्रशासनिक अक्षमता नहीं तो और क्या है?

देश की राजधानी दिल्ली जो अधिकतर नकारात्मक कारणों से ही चर्चा में रहती है। कभी प्रदूषण को लेकर तो कभी आग में दर्जनों लोगों की मौत को लेकर!

फ़िलहाल चर्चा का केंद्र बना है रानी झाँसी रोड पर अनाज के गोदाममे लगा आग। जरा सोचिए यह लेख लिखे जाने तक 45 लोगों के मरने की खबर आ चुकी है और यह संख्या बढ़ भी सकती है। जो लोग इस अग्नि कांड में मारे गए हैं उनके परिवार पर क्या बीत रही होगी इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है।

ज्ञात हो कि भारत के विभिन्न कोनों से लोग दिल्ली में रोजगार की तलाश में आते हैं ताकि वह अपने परिवार की देखभाल कर सकें। लेकिन परिवार की देखभाल तो छोड़ ही दीजिए परिवार का रहा सहा सहारा भी उनके हाथ से छूट जाता है।

बड़ा प्रश्न यह उठता है कि दिल्ली के केंद्र में जहां भारतीय जनता पार्टी की मजबूत सरकार है वहीं दिल्ली गवर्नमेंट के अरविंद केजरीवाल भी दिल्ली चुनाव में 67 सीटों से अधिक जीतने का दावा कर रहे हैं। क्या वाकई इतनी बड़ी कैजुअल्टीज के बाद वह लोगों को मुंह दिखाने के लायक हैं।

दिल्ली को फ्री सब्सिडी से लाभ देने वाले अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम के अफसर आखिर यह क्यों नहीं जान पाते कि कहां पर अवैध फैक्ट्रियां चल रही है और कहां पर नाम का दुरुपयोग किया जा रहा है। अगर इस सन्दर्भ में प्रशासनिक तत्परता दिखलाई गई होती तो क्या असमय काल के गाल में समा गए 45 लोग बच नहीं गए होते।

मुश्किल यह है कि राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों के लिए लोगों की जान भेड़ बकरी से ज्यादा कीमत नहीं रखती है। सरकारी अधिकारियों को पता है कि वह एक तो सस्पेंड नहीं होंगे और सस्पेंड हो भी जाएंगे तो उनकी बहाली कोई नहीं रोक सकता।

इसीलिए वह अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त रहते हैं। वहीं राजनेताओं को भी पता होता है कि चाहे लाख जनता नाराज हो चुनाव में उन्हें वोट देगी देगी। उनको नहीं देगी तो विरोधी पार्टी को दे देगी और विरोधी पार्टी ही कौन सी दूध की धूली है! ऐसी स्थिति में जनता विवश हो जाती है।

आग लगने की घटनाओं जिसमें परिवार के परिवार स्वाहा हो जाते हैं उस पर इस तरह की लापरवाही वह भी दिल्ली जैसे शहर में अपने आप में शर्मनाक है। ऐसी घटना हमारे प्रशासन के माथे पर कलंक है। देखना होगा कि इस अव्यवस्था, इस ढीलेपन के जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई होती है। साथी ऐसे क्या उपाय किए जाते हैं ताकि इस तरह की अवैध गतिविधियां फल फूल ना पाए।

गणेश यादव, सम्पादक
(लोकतंत्र की बुनियाद, राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका)